Why is EV Resale Value Dropping So Fast Worldwide? Golden opportunity to buy a used EV?

जब आप एक ब्रांड न्यू इलेक्ट्रिक कार लेने जाते हो तो वह आपको उसके आइस काउंटर पार्ट से 30 से 60% तक महंगी मिलती है। फॉर एग्जांपल Tata Tiago पेट्रोल के बेस मॉडल का प्राइस ₹4.99 लाख एक्स शोरूम का पड़ता है। वहीं सेम बेस वेरिएंट में इस गाड़ी के जो ईवी वर्जन का प्राइस है वह लगभग ₹8 लाख का पड़ता है। यानी कि गाड़ी भी सेम है और वेरिएंट भी सेम है। लेकिन अगर आप पेट्रोल से EV की तरफ स्विच करते हो तो आपको 60% तक ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं। इसका मतलब खरीदते टाइम जो EV होती है वो काफी ज्यादा महंगी पड़ती है। और अगर ऐसा है तो यह बेचते टाइम भी महंगी पड़नी चाहिए। है ना? भाई जब आपने गाड़ी खरीदी महंगी थी तो अब आप उसको बेचोगे भी तो महंगा ही लेकिन क्या ऐसा हो रहा है? जी 27% [संगीत] मार्केट पूरी दुनिया के अंदर इलेक्ट्रिक कार्स की रीसेल वैल्यू बहुत ज्यादा तेजी से गिर रही है और हार्डली यूज्ड एक से डेढ़ साल पुरानी इलेक्ट्रिक कार के प्राइस में ही 25 से 30% तक का ड्रॉप हमें देखने को मिल रहा है। जैसे कि यह चार्ट देखो। वैल्यू माय कार नाम की एक यूके बेस्ड कंपनी ने एक स्टडी पब्लिश करी है। जिसमें उन्होंने यह दिखाया है कि एक यूज्ड आइस कार की रीसेल वैल्यू और उसी आइस कार के ईवी काउंटर पार्ट की जो रीसेल वैल्यू है उनमें कितना ज्यादा डिफरेंस आता है। जैसे कि हम यहां पर देख सकते हैं कि जो आइस वर्जन वाला F150 पिकअप ट्रक है उसका प्राइस लगभग $55,000 का था जब वो नया था। और वहीं अगर हम इसे यूज्ड मार्केट के अंदर देखें तो ऑन एन एवरेज इस गाड़ी का जो प्राइस है वह $42,000 के आसपास का पड़ रहा है। यानी कि 22% की गिरावट इसकी रीसेल वैल्यू में देखने को मिली है। वहीं अगर अब हम देखें F150 लाइटनिंग को जो कि इस पिकअप ट्रक का ईवी वर्जन है तो उसका प्राइस लगभग $85,000 के आसपास हुआ करता था जब यह नया था। लेकिन इस इलेक्ट्रिक पिकअप ट्रक का अब जो ऑन एन एवरेज यूज्ड कार मार्केट में प्राइस है वह है $44,000। यानी कि इस गाड़ी का जो प्राइस है वो भयंकर 48% तक गिरा है। और हैरानी वाली बात यह है कि ये गाड़ी आज से सिर्फ 3 साल पहले लॉन्च हुई थी। वैसे ही अगर हम दूसरी गाड़ियों को देखें जैसे कि Hyundai तो उसके पेट्रोल वर्जन में हमें 7% तक का ड्रॉप देखने को मिलता है। लेकिन वहीं उसके ईवी वेरिएंट के अंदर 14% तक का। ऐसे ही एस क्लास में हम 40% तक का ड्रॉप देख सकते हैं। लेकिन ईक्यूएस यानी कि जो इलेक्ट्रिक एस क्लास मानी जाती है उसमें 60% तक का ड्रॉप देखा जा सकता है। यानी किसी में कम तो किसी में ज्यादा लेकिन आइस कार से मुकाबले EVS की जो रीसेल वैल्यू है वो ऑन एन एवरेज खराब ही दिखाई देती है। और इन्होंने जो अपने इस चार्ट का टोटल करके दिखाया है उसके अंदर भी हम यह देख सकते हैं कि आइस व्हीकल्स ऑन एन एवरेज 35% तक वैल्यू लूज करते हैं। वहीं ईवीस 42% तक। अब यह जो डाटा है यह बाहर की मार्केट्स का है। लेकिन इंडिया का क्या? क्या इंडिया के अंदर भी यही सिनेरियो है? देखो इंडिया की जो ईवी मार्केट है ना वह अभी उतनी ज्यादा मैच्योर नहीं है। तो क्लियर ट्रेंड अभी हम देख नहीं पा रहे हैं। लेकिन मैंने ऑनलाइन पोर्टल्स के ऊपर कई सारी ईवीज ऐसी देखी हैं जिनमें प्राइस ड्रॉप बहुत ही ज्यादा बड़ा हुआ है। नई-नई इलेक्ट्रिक कार्स जो कि बहुत ही कम चली हैं उनके प्राइस में भी हमें बहुत तगड़ा ड्रॉप देखने को मिल रहा है। और ईवी ओनर्स भी यह बात मानकर चल रहे हैं कि उनको अपनी गाड़ी यूज़्ड कार मार्केट के अंदर निकालने में काफी ज्यादा दिक्कतें आने वाली है। लेकिन इन्हीं सब बातों से एक बड़ा सवाल यह उठता है कि ये जो इलेक्ट्रिक कार्स हैं ये अपनी वैल्यू इतनी तेजी से क्यों खो रही हैं? और क्या जब यह इतनी वैल्यू खो चुकी हैं तो इन्हें यूज्ड कार मार्केट के अंदर लेना सेंस बनाता है क्योंकि यह तो स्टील डील हो गई ना एक तरीके से। ऐसे कई सारे सवालों का जवाब मैंने इस वीडियो के अंदर आगे दिया है। लेकिन उससे पहले आप यह समझ लीजिए कि ये जो ईवीज अपनी बहुत ज्यादा तेजी से रीसेल वैल्यू खो रही है ना इसकी वजह से इंटरनेशनल मार्केट में यूज़्ड ईवीज की ईयर ऑन ईयर सेल्स में भारी जंप देखने को मिल रहा है। फॉर एग्जांपल हम सबसे पहले यूके व्हीकल्स की मार्केट है उसमें 57% तक की ईयर ऑन ईयर ग्रोथ देखने को मिल रही है। वहां पर Tesla मॉडल 3, K E नाइट्रो और ऐसी ही जो छोटी और मिड साइज इलेक्ट्रिक कार्स है ना उनकी डिमांड अच्छी खासी देखने को मिल रही है यूज़्ड कार मार्केट के अंदर। वैसे ही अगर हम कोरिया की बात करें तो यहां पर जो ट्रेंड है वह तो और भी ज्यादा इंटेंस दिखाई देता है। कोरिया में जो ओवरऑल यूज्ड कार मार्केट है ना उसमें 2025 के अंदर 4% का डिक्लाइन देखने को मिला था। वहीं पर जो यूज्ड इलेक्ट्रिक कार्स हैं उनकी मार्केट में अकेले 47.4% तक की ग्रोथ देखने को मिली थी। यानी कि जो कोरिया की यूज़्ड कार मार्केट में गिरता हुआ ट्रेंड देखा जा रहा है, उसका यूज़ ईवीस की ग्रोथ पर कोई भी फर्क नहीं पड़ रहा है। इसके बाद अगर हम यूएस की बात करें तो वहां पर भी गेम ना थोड़ा अलग ही चल रहा है। यूएस में नई ईवीज की सेल्स में 6% तक का डिक्लाइन देखा जा रहा है। यानी कि लोग पहले के मुकाबले नई इलेक्ट्रिक कार्स कम खरीद रहे हैं वहां पर। लेकिन यूएस में जो पुरानी इलेक्ट्रिक कार्स की मार्केट है उसमें ईयर ऑन ईयर 45% तक की बढ़त देखी जा रही है। अब यह जो यूज़्ड ईवीसी की सेल्स में हम इंक्रीमेंट देख पा रहे हैं वो एक तो इसीलिए है कि जो ईवीज होती है उनकी रीसेल वैल्यू बहुत ज्यादा खराब होती है। इनकी वैल्यू बहुत ज्यादा तेजी से गिर रही है। इसकी वजह से लोग इनको ज्यादा खरीद रहे हैं। लेकिन इसके पीछे एक बड़ा रीज़न मुझे और लगता है और वो यह है कि ईवीस आर चीपर टू ड्राइव। फॉर एग्जांपल हम यहां पर Tata Tiago के फिर से बेस वेरिएंट की बात कर लेते हैं। इसके जो बेस वेरिएंट का ऑन रोड प्राइस पड़ता है वो है ₹5.61 लाख। जब हम आइस व्हीकल की बात कर रहे हैं। वहीं अगर हम इसके ईवी वेरिएंट की बात करें तो वह पड़ता है ₹8.46 लाख ऑन रोड। अब आप मान लो कि आप अपनी Tata Tiago पेट्रोल को हर साल 10,000 कि.मी. चलाओगे और हम यह भी मान लेते हैं कि यह गाड़ी लगभग 16 kmpl की माइलेज निकाल कर दे देगी। यानी अगर आप 10,000 कि.मी. इस गाड़ी को चलाते हो तो आपका 6,25 लीटर्स तक का फ्यूल खर्च हो जाएगा। और जो इसकी फ्यूल की कॉस्ट पड़ेगी ना आपको वो पड़ेगी ₹65,000। वहीं अगर हम इसे कंपेयर करें इसके EV वाले वेरिएंट से तो यह जो EV Tiago है यह 7.5 किमी/ kw में जाएगी और अगर आप इसको 10,000 कि.मी. चलाते हो तो आपकी ₹133 किवा आर की बिजली लगेगी। जिसकी कॉस्ट हम मान के चलते हैं ₹8 पर यूनिट के हिसाब से। तो इस गाड़ी को 1 कि.मी. चलाने की जो कॉस्ट आएगी वो आएगी 1.07 पर कि.मी. की। यानी कि अगर आप इस Tiago EV को 10,000 कि.मी. चलाते हो तो वह चलाने का जो आपका खर्च आएगा वह होगा ₹1,664 के लगभग जो कि पेट्रोल पर चलाने के ₹65,000 के खर्च से बहुत ही ज्यादा कम है। लेकिन फिर भी जो नई Tiago EV है उसकी अपफ्रंट कॉस्ट ही ₹3 लाख ज्यादा है पेट्रोल वाली के मुकाबले। इसीलिए यह जो प्राइस डिफरेंस है ना सिर्फ इसी को मैच करने में आपको 5 साल और 3 महीने लग जाएंगे। अगर आप अपनी पेट्रोल Tiago को ₹10,000 कि.मी. चलाते हो हर साल जो कि ज्यादातर इंडियन चलाते ही हैं। ऑन एन एवरेज इतना ही चलाते हैं लोग। लेकिन वहीं अगर आप यूज्ड इलेक्ट्रिक Tiago लेते हो तो आपकी सारी की सारी प्रॉब्लम सॉल्व हो जाएंगी। क्योंकि मान के चलो आप सिर्फ 2 साल पुरानी Tiago EV खरीदते हो तो जो उसका प्राइस होगा ना वह ओरिजिनल प्राइस से 2 से ₹3 लाख ऑलरेडी कम हो चुका होगा। यानी कि यूज़ Tiago EV का जो प्राइस है वो नई आइस वाली Tiago जितना ही होगा लेकिन अंधाधुंध सेविंग के साथ मिलेगी ये गाड़ी आपको। तो अब तक हम दो बातें क्लियरली समझ चुके हैं। एक तो यह है कि जो ईवीज है उनकी रीसेल वैल्यू बहुत ही ज्यादा तेजी से गिर रही है। और दूसरी बात यह कि यह जो गिरती हुई वैल्यू है ना इसकी वजह से इन गाड़ियों की यूज़्ड कार मार्केट के अंदर डिमांड बहुत ही ज्यादा तेजी से बढ़ रही है यानी कि इलेक्ट्रिक कार्स की। तो अब तक हम ये दो बातें कर चुके हैं। लेकिन अभी तक भी हमने मेन मुद्दे की बात नहीं करी है। और वो यह कि यार यह जो रीसेल वैल्यू है इलेक्ट्रिक कार्स की वो इतनी तेजी से गिर क्यों रही है? ऐसी क्या कमी है EVs के अंदर आखिर? देखो यार, इसके पीछे मुझे तीन मेजर रीज़ंस दिखाई देते हैं। नो आफ्टर मार्केट सपोर्ट, रियली एक्सपेंसिव पार्ट्स और बैटरी डिग्रेडेशन। चलो, सबसे पहले हम पॉइंट नंबर वन पर बात करते हैं। यार, जब एक कार ओनर अपनी गाड़ी को चार से पांच साल चला चुका होता है ना, तो यह सोचता है कि यार बाहर की गैराज से हम अपनी गाड़ी में काम करवा देते हैं। कुछ या अगर कोई रिपेयर वगैरह आ रहा है तो क्योंकि जब गाड़ी की वारंटी एक्सपायर हो जाती है ना तो सर्विस सेंटर पे काम कराना काफी ज्यादा महंगा पड़ता है। फिर चाहे आप सर्विस कॉस्ट ले लो, रिपेयर वगैरह कोई अगर आ जाए तो उसकी कॉस्ट ले लो। मतलब हर जगह ही आपको जो खर्चा है वह बहुत ही ज्यादा करना पड़ता है और वहीं अगर आप बाहर की गैराज में काम कराते हो तो यही खर्चा बहुत ज्यादा कम पड़ जाता है। सब नहीं कराते ऐसे लेकिन बहुत ज्यादा लोग करवाते हैं। लेकिन ईवी के साथ फिलहाल तो ये चीजें पॉसिबल नहीं है। इन पर अभी कोई भी रोड साइड मैकेनिक या फिर बाहर की गैराज वाला बंदा हाथ नहीं लगाना चाहता है। बैटरी और मोटर्स तो आप छोड़ ही दो। आपका लोकल गैराज, ईवी के चार्जिंग पोर्ट, कूलिंग पंप्स और टेंपरेचर जैसी बाकी छोटी चीजों को भी हाथ नहीं लगाएगा। और सबसे बड़ी बात यह है कि जो ईवीज होती है वो ज्यादातर सॉफ्टवेयर ड्रिवन होती हैं। कई सारी चीजें सॉफ्टवेयर से ही कंट्रोल होती हैं। यानी अगर आप कोई भी पार्ट रिप्लेस या फिर रिपेयर करते हो तो हो सकता है आपको उसके बाद सॉफ्टवेयर से इंटीग्रेट करना पड़े उसको या कोई ना कोई दिक्कत आ जाए जिसके लिए आपको सर्विस सेंटर जाना ही पड़े। इसीलिए यह काम बिना ओईएम के सर्विस सेंटर के होना बहुत ही ज्यादा मुश्किल है। इसके बाद अगर हम दूसरी दिक्कत की बात करें तो वो है चाइल्ड पार्ट की कमी होना। ईवीस में तो वैसे थ्योरेटिकली बड़ी दिक्कतें कम ही आती हैं। लेकिन अगर मान लो कोई बड़ी दिक्कत आ गई और आपकी वारंटी भी एक्सपायर हो चुकी है तो ब्रांड आपका लाखों रुपए का बिल बना सकता है। और ऐसा इसलिए क्योंकि ईवीस जो होती है उनमें तीन मेजर कॉम्पोनेंट्स होते हैं। बैटरी, बीएएमएस और मोटर। और अगर मान लो इनमें से किसी भी एक पार्ट के अंदर कोई भी दिक्कत आ जाती है जिसकी वजह से फंक्शन नहीं कर पा रहे हैं तो इन्हें पूरा का पूरा ही बदलना पड़ता है क्योंकि यह जो मॉड्यूल होते हैं ना यह बहुत टाइटली इंटीग्रेटेड होते हैं और इनके जो रिपेयर्स होते हैं ना वो मैकेनिकल कार्स जितने सक्सेसफुल नहीं होते हैं। जैसे मान लो आपकी एक आइस कार के क्लच में कोई दिक्कत आ जाती है तो आपकी क्लच प्लेट बदल दी जाती है। ज्यादातर ऐसा नहीं होता कि आपका पूरा का पूरा क्लच सिस्टम ही बदलना पड़ता है। लेकिन ईवी के अगर किसी एक कॉम्पोनेंट में इस तरीके के बड़े कॉम्पोनेंट में दिक्कत आती है तो उसको फुल रिप्लेसमेंट करना पड़ता है। और अगर आपकी ईवी की वारंटी एक्सपायर हो चुकी है तो आपको बहुत ज्यादा मोटा खर्चा करना पड़ेगा क्योंकि भैया पूरा का पूरा एक मेजर कॉम्पोनेंट बदलने की बात हो रही है यहां पे। मैं ये नहीं कह रहा कि सारे के सारे ब्रांड्स ऐसा ही करते होंगे। लेकिन ज्यादातर ब्रांड्स अभी ऐसा ही कर रहे हैं और हो सकता है कि ये चीजें आगे बदले चाइल्ड पार्ट्स बढ़े और रिपेयर्स वगैरह बढ़ जाए जब कंपटीशन बढ़ जाए मार्केट के अंदर। लेकिन फिलहाल तो यही सिनेरियो है। ज्यादातर पार्ट्स बदले ही जा रहे हैं। अब ये तो वो पॉइंट्स थे जो कि ज्यादा वेल डिस्कस्ड नहीं है। लेकिन एक पॉइंट ऐसा है जो कि वेल डिस्कस्ड भी है और जिसकी वजह से ईवीस की जो रीसेल वैल्यू है ना वो सबसे ज्यादा खराब होती है और वो है बैटरी डिग्रेडेशन। अगेन हम इसको एक एग्जांपल से समझ लेते हैं। जब हम एक ब्रांड न्यू फोन लेकर आते हैं तो जो उसकी बैटरी कैपेसिटी होती है ना वह 100% होती है। लेकिन जैसे ही 3- 4 साल बीतते हैं, 4 साल बीतते हैं तो जो उसकी बैटरी कैपेसिटी होती है वो 80-85% के आसपास आ जाती है। जैसे आपने iPhone वगैरह में देखा होगा उसमें बैटरी हेल्थ को दिखाता है कितनी परसेंटेज है। अब जो जनरल पब्लिक है ना उसके मन में यही धारणा है कि जो ईवीज होती है ना उनके साथ भी ऐसा ही होता है। कुछ ही सालों के अंदर उनकी बैटरी जो है वो बहुत ज्यादा डिग्रेड कर जाती है। तो क्या यह सच है? वेल, यह सच तो है, लेकिन पूरा नहीं है। देखो जो ज्यादातर फोंस होते हैं ना, उनमें सिंगल सेल बैटरी होती है। लेकिन जो ईवीज की बैटरीज होती है उनमें हजारों सेल्स होते हैं और जरूरी नहीं है कि हर एक सेल एक ही पेस पे डिग्रेड हो। और अगर होता भी है तो वो इतनी तेजी से नहीं होता जितना फोन की बैटरी का होता है। क्योंकि किसी भी इलेक्ट्रॉनिक्स में बैटरी के डिग्रेड होने के दो बड़े रीज़ंस होते हैं। एक तो हीट और दूसरा है चार्जिंग साइकिल। और जहां बाकी इलेक्ट्रॉनिक्स में बैटरी को ठंडा करने के लिए पैसिव कूलिंग का इस्तेमाल किया जाता है। यानी कि जो आपकी डिवाइस की बैटरी होती है, वह एटमॉस्फेरिक टेंपरेचर की वजह से अपने आप थोड़ी-थोड़ी ठंडी हो जाती है। वहीं ईवीज को ठंडा करने के लिए डेडिकेटेड लिक्विड कूलिंग सिस्टम इस्तेमाल किया जाता है। जो कि बहुत ही ज्यादा इफेक्टिव होता है और आपकी गाड़ी के बैटरी के टेंपरेचर को 20 टू 35° सेंटीग्रेड के बीच में रखता है। और इसीलिए इलेक्ट्रिक कार्स की बैटरीज की जो लाइफ होती है ना वह उतनी तेजी से नहीं गिरती है जितने हमारे फोन वगैरह की गिरती है। लेकिन फिर भी गिरती तो है। और जो ईवीस के अंदर बैटरी डिग्रेडेशन का स्टैंडर्ड है वह लगभग 2 से 3% पर ईयर का है। यानी कि अच्छी से अच्छी बैटरी भी लगभग 2% तक तो डिग्रेड हो सकती है साल के अंदर। यानी कि अगर आप 10 साल तक अपनी गाड़ी चलाते हो तो हो सकता है आपकी गाड़ी की बैटरी 20% तक गिर जाए। अगेन यहां पर मैं अच्छी वाली बैटरीज की बात कर रहा हूं जिनको डिजाइन अच्छे से किया गया है वो 20% तक गिरेंगी। वरना जिसकी क्वालिटी अच्छी नहीं होगी वह और भी ज्यादा गिर सकती है। अब देखा जाए तो यह कोई न्यू कार बायर्स के लिए बड़ी दिक्कत वाली बात नहीं है। लेकिन जब आप एक यूज़ कार लेने जाते हो तो यह एक चिंता का विषय जरूर बन जाता है। क्योंकि वह कुछ भी करके बैटरी की कैपेसिटी बढ़ा नहीं सकते हैं। ऐसा करने के लिए उन्हें पूरी की पूरी बैटरी चेंज करनी पड़ेगी। जिसकी कॉस्ट गाड़ी की वैल्यू की लगभग 60% तक आ सकती है। यानी कि अगर कोई गाड़ी ₹12 लाख की है तो उसकी बैटरी की कॉस्ट ही ₹7 लाख तक हो सकती है। वहीं अगर कोई यूज्ड आइस कार लेने जाता है तो अक्सर यह देखने को मिलता है कि अगर रिलायबल ब्रांड की गाड़ी है और उसको ढंग से मेंटेन करके रखा गया है तो गाड़ी की माइलेज तक खराब नहीं होती है। वहीं आप ईवीज को कितना भी मेंटेन कर लो रेंज ड्रॉप एक फैक्ट है और वह होकर ही रहेगा। इसीलिए यूज्ड कार मार्केट्स के अंदर ईवीसी रीसेल इतनी ज्यादा खराब है। अब बैटरी डिग्रेड होती है यह तो हम समझ गए हैं। लेकिन कई ब्रांड्स अपनी गाड़ियों की बैटरीज पर लाइफ टाइम वारंटी भी दे रहे हैं। उसका क्या? वो तो हेल्प कर सकती है ना यूज़्ड कार बायर्स को। हां, दे तो रहे हैं, लेकिन कुछ ब्रांड्स के लिए जो लाइफ टाइम वारंटी है ना, यह सिर्फ 15 साल की ही होती है। यानी कि जितने टाइम तक आपकी गाड़ी रजिस्टर्ड होती है पहली बार में उतनी। और यह भी सिर्फ फर्स्ट टाइम कार ओनर्स के लिए। अगर आप सेकंड ओनर हैं, तो आपको सिर्फ 8 साल की वारंटी मिलेगी और इसमें भी कई ब्रांड्स नहीं देते हैं। यह भी नहीं देते। इसके अलावा यह जो लाइफटाइम वारंटी है यह क्लेम भी तभी करी जा सकती है जब आपकी बैटरी लाइफ 70% से नीचे चली जाए जो कि जरूरी नहीं है आपके वारंटी पीरियड के अंदर हो ही जाए और अगर आप एक यूज्ड कार ले रहे हो तो वैसे भी आपको 8 साल की ही वारंटी मिलने वाली है और हो सकता है आपको यह भी ना मिले तो इसीलिए जो यूज्ड कार बायरर्स हैं उनके लिए एक बड़ा स्ट्रेचिंग पॉइंट रहता है यूज्ड कार खरीदते टाइम कि भैया बैटरी डिग्रेड होगी तो मैं क्या करूंगा और यह जो डर है ना वह थोड़ा सा सेंस भी बनाता है क्योंकि जो आइस कार्स होती है उनमें कोई भी ऐसा सिंगल कॉम्पोनेंट नहीं होता जो इतना ज्यादा महंगा हो वहीं ईवीज के अंदर ऑब्वियसली बैटरी काफी ज्यादा महंगी होती जैसा मैंने पहले बताया आपको। तो अब हम जान चुके हैं कि ईवीस की रीसेल वैल्यू खराब क्यों हो रही है और क्यों इनकी डिमांड हाई है। तो अब हम यह भी जान लेते हैं कि क्या इंडियन बायर को एक यूज्ड ईवी खरीदनी चाहिए? ले सकते हो यार मेरे हिसाब से वैसे तो क्योंकि अगर आप दो से 3 साल पुरानी इलेक्ट्रिक कार ले रहे हो यूज्ड वाली तो तब भी उसका जो प्राइस होगा वो बहुत ज्यादा ड्रॉप हो चुका होगा। ऊपर से आपको 8 साल की वारंटी तो मिलने वाली है ही। लेकिन इन सब बातों के बावजूद भी आपको एक काम बहुत जरूरी करना पड़ेगा जब आप यूज़्ड EV लेने जाओगे और वो यह कि आपको इस गाड़ी को लेकर जाना पड़ेगा सर्विस सेंटर और वहां पर इस गाड़ी की बैटरी हेल्थ चेक करानी पड़ेगी। यह थोड़ा सा कॉम्प्लिकेटेड प्रोसेस है इसलिए आप इसको बाहर नहीं करा सकते। फिलहाल इंडिया के अंदर तो ऐसा ही है। इसके लिए आपको सर्विस सेंटर पर ही जाना पड़ेगा क्योंकि वो वहां पर अपने सिस्टम्स वगैरह लगाकर चेक करते हैं कि जो एक-एक सेल है गाड़ी की बैटरी का उसकी जो हेल्थ है वो कैसी है और अगर आपको सब कुछ ठीक लगे तभी एक सेकंड हैंड ईवी लेना। तो यह जरूर कर लेना आप एक यूज़्ड ईवी लेने से पहले। बाकी इस वीडियो के अंदर इतना ही। अगर आपको पसंद आई हो तो प्लीज कंसीडर सब्सक्राइबिंग टू आवर चैनल। इस वीडियो को लाइक करिए, शेयर करिए और कमेंट्स में अपने विचार भी जरूर छोड़ के जाना। थैंक यू।

Across the globe, from the US to Europe to India, electric car prices are falling faster than anticipated. But what’s really causing this crash? Is it a sign that EVs are failing… or is the market just shifting?

In this video, we’ll break it all down:

The 5 main reasons why EV resale values are dropping

How battery health, tech upgrades, and limited warranties are affecting buyer confidence

Why newer, cheaper EV models are making old ones harder to sell

And most importantly, is this a red flag or a golden opportunity to buy a solid used EV for less?

If you’re thinking about buying or selling an electric vehicle, you need to watch this before you make a move.

#ElectricCars #UsedEV #EVResaleValue

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